Monday, May 6, 2019

चार महीने में कितना जादू दिखा सकीं प्रियंका गांधी

अख़बार लिखता है कि सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने 2 मई को यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच कर रही समिति को एक पत्र लिखा था.
इसमें जस्टिस चंद्रचूड़ ने लिखा है कि जांच करने वाली समिति में एक बाहरी सदस्य को भी शामिल किया जाए.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की कुछ रिटायर्ड महिला जजों को भी समिति में शामिल करने का सुझाव दिया है. इसमें जस्टिस रुमा पाल, जस्टिसल सुजाता मनोहर और जस्टिस रंजना देसाई शामिल हैं.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल ने इस बात से इनकार किया है कि जस्टिस चंद्रचूड़ ने समिति की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस बोबड़े से शुक्रवार को मुलाक़ात की थी.
इंडियन एक्सप्रेस ने इस पर खेद जताते हुए लिखा है कि जस्टिस चंद्रचूड़ ने जस्टिस बोबड़े से गुरुवार को मुलाक़ात की थी न कि शुक्रवार को.
नवभारत टाइम्स की ख़बर के मुताबिक़, किसी पब्लिक मीटिंग या रोड शो के दौरान अब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को माला पहनाना या उनसे हाथ मिलाना आसान नहीं होगा.
अगर कोई ऐसा करना भी चाहेगा तो पहले उसे मुख्यमंत्री की सुरक्षा के घेरे को पार करना होगा. यहां से हरी झंडी मिलने के बाद ही वो केजरीवाल के क़रीब जा पाएगा, वरना नहीं.
शनिवार को मोती नगर इलाक़े में केजरीवाल को थप्पड़ मारे जाने के बाद दिल्ली पुलिस ने उनकी सुरक्षा में बड़े स्तर पर बदलाव किए हैं, जिसमें एक बदलाव यह भी है कि उनके पास जाने से लोगों को रोका जाए.
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उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने अमेठी और रायबरेली में अपने मतदाताओं से कांग्रेस के पक्ष में वोट डालने की अपील की.
हालांकि इन दोनों जगहों पर गठबंधन ने उम्मीदवार न उतारने का फ़ैसला किया था और उम्मीदवार उतारे भी नहीं थे, लेकिन सवाल ये है कि इस घोषणा के बावजूद मायावती को ऐसी अपील क्यों करनी पड़ी.
क्या मायावती की यह अपील भविष्य में बनने वाली सरकार का स्वरूप तय करेगी?
पूर्व में मायावती जितना भाजपा पर अक्रामक रही हैं, उससे कहीं ज़्यादा कांग्रेस को उन्होंने निशाने पर लिया है.
मायावती ने रविवार को भी दोनों पार्टियों को निशाने पर लिया, लेकिन अंत में कांग्रेस के प्रति उनका लहजा थोड़ा मधुर हो गया.
उन्होंने कहा, "कांग्रेस और भाजपा एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं. इसके बावजूद भी हमने देश और आम जनहित में ख़ासकर भाजपा और आरएसएसवादी ताक़तों को कमज़ोर करने के लिए उत्तर प्रदेश की अमेठी और रायबरेली सीट को कांग्रेस पार्टी के लिए इसलिए छोड़ दिया था ताकि इस पार्टी के दोनों सर्वोच्च नेता इन दोनों सीटों में उलझ कर न रह जाएं."
"यदि ये अकेले यहां चुनाव लड़ते हैं तो ये देश की अन्य सीटों को जीतने में अपनी ऊर्जा लगा सकेंगे. अगर गठबंधन ऐसा नहीं करता तो भाजपा इसका फ़ायदा उठाती."
ने बीजेपी पर लगाया आरोप
अब सवाल यह उठता है कि कांग्रेस का हमेशा विरोध करने वाली मायावती इतनी नरम क्यों पड़ रही हैं?
इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि मायावती को अल्पसंख्यकों का वोट चाहिए. इसलिए वो यह नहीं दिखाना चाहती हैं कि वो कांग्रेस को हरा कर भाजपा को जिताना चाहती हैं.
वो कहते हैं, "उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश की दो सीटों पर कांग्रेस कोzउनको दिल्ली में प्रधानमंत्री या उप प्रधानमंत्री बनना है तो उन्हें भाजपा या कांग्रेस से हाथ मिलाना होगा."
"भाजपा में मायावती को इन पदों की गुंजाइश कम नज़र आती है, इसलिए कांग्रेस को वो विकल्प के रूप में देखती हैं. कांग्रेस के साथ जाने में यह भी फ़ायदा है कि आगे चल कर अल्पसंख्यक उनसे नाराज़ नहीं होंगे."
रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि मायावती यह भी सोचती हैं कि कांग्रेस की सीटें कम आती हैं और अगर एचडी देवेगौड़ा या इंद्र कुमार गुजराल जैसी स्थिति बनती है तो वो सत्ता पर क़ाबिज़ हो सकती हैं.
मायावती की राजनीति कांग्रेस विरोध की रही है. जब अस्सी के दशक में कांसीराम ने बहुजन समाज पार्टी को स्थापित करना शुरू किया, उस वक़्त भाजपा इतनी ताक़तवर पार्टी नहीं थी.
कांग्रेस के विरोध के कारण ही बसपा का जन्म हुआ है इसलिए उसका मूल चरित्र कांग्रेस विरोध का रहा है. आज की राजनीति में भी बसपा अपने मूल चरित्र से बाहर नहीं जा सकती है. यह एक स्थायी भाव है, जिसके तहत पार्टी कांग्रेस की आलोचना करती है.
बसपा का दलित वोट ही उनका आधार है, जो कभी कांग्रेस का हुआ करता था. कभी भी यह वोट बैंक कांग्रेस की तरफ़ लौट सकता है, यह ख़तरा बसपा को हमेशा महसूस होता है.
वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं, "आज राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है. पिछले कुछ चुनावों में कांग्रेस हाशिएए पर चली गई और भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की जगह ले ली."
"आज की स्थिति में दलित और ग़ैर-यादव ओबीसी वोटों पर भाजपा ने सेंध लगा दी है. 2014 में भी इस वर्ग का बड़ा समर्थन नरेंद्र मोदी को मिला था."
वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं कि अगर भाजपा को रोकना है तो कांग्रेस का भी छुपा हुआ हाथ गठबंधन पर होना चाहिए. ये ज़रूरत पहले से महसूस की जा रही थी.
"कांग्रेस के साथ सपा-बसपा का गठबंधन भले न हो पाया हो, लेकिन भीतर ही भीतर भाजपा को हराने के लिए आज उन्हें महसूस हो रहा है कि कांग्रेस साथ में होनी चाहिए थी."
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