Thursday, December 20, 2018

روسيا "استغلت مواقع التواصل الاجتماعي" للتأثير في الانتخابات الأمريكية

تحدث تقرير حديث عن مزاعم تشير إلى استخدام روسيا لجميع منصات التواصل الاجتماعي الكبرى بغية التأثير في الانتخابات الأمريكية التي جرت عام 2016.
ومن المتوقع أن يشير بحث إلى استخدام منصات "يوتيوب" و"تامبلر" و"انستغرام" و"باي بال" فضلا عن "فيسبوك" و"تويتر" في نشر دعاية.
وسوف ينشر مجلس الشيوخ الأمريكي الأسبوع الجاري تقريرا يوضح بشكل مفصل نطاق حملة المعلومات المغلوطة الروسية التي أحاطت بالانتخابات الأمريكية.
وانتقد المشرفون على إعداد التقرير، الذي أعده مشروع الدعاية الحاسوبية التابع لجامعة أوكسفورد وشركة "غرافيكا" لتحليل شبكات التواصل الاجتماعي، "الاستجابة المتأخرة وغير المنسقة" من جانب شركات التكنولوجيا.
ويعد هذا التقرير أول تحليل يدرس ملايين المشاركات على منصات التواصل الاجتماعي، التي قدمتها شركات "تويتر" و "غوغل" و "فيسبوك، للجنة المخابرات بمجلس الشيوخ.
وعلى الرغم من أن "فيسبوك" و"تويتر" كشفا في وقت سابق التدخل الروسي، إلا أنه ليس معلوما حجم الاستعانة بمنصات أخرى.
ويشير التقرير إلى أن "يوتيوب" و"تامبلر" و"باي بال" و"غوغل بلس" تضررت جميعها، إذ لجأت روسيا إلى استخدام تقنيات "التأقلم" من التسويق الرقمي لاستهداف جمهور في قنوات متعددة.
ولم تحدد اللجنة بعد إذا كانت تؤيد النتائج، على الرغم من أنها تعتزم نشر التقرير علنا إلى جانب تقرير آخر.
وطلبت بي بي سي من السفارة الروسية في بريطانيا التعليق.
وتحدث التقرير بالتفصيل عن حملة واسعة تقودها وكالة أبحاث الإنترنت، وهي شركة روسية وصفتها المخابرات الأمريكية بأنها "لجان إليكترونية لتوجيه الرأي العام" ذات صلة بالحكومة الروسية.
ويقول التقرير إن روسيا ركزت على استهداف الناخبين المحافظين على نحو خاص من خلال نشر مشاركات تتعلق بالهجرة والأصول العرقية وحق امتلاك سلاح.
كما رصد التقرير جهودا تهدف إلى الحد من القوة التصويتية للمواطنين الأمريكيين من أصول أفريقية من ذوي الميول اليسارية عن طريق ترويج حملة مغلوطة تتعلق بالعملية الانتخابية.
وقال التقرير :"من الواضح أن جميع الرسائل سعت إلى تحقيق استفادة للحزب الجمهوري، ودونالد ترامب على نحو خاص".
وأضاف التقرير :"يُذكر ترامب كثيرا في الحملات التي تستهدف الناخبين المحافظين واليمين، إذ شجعت الرسائل هذه الفئات على دعم حملته. في حين نُشرت رسائل للفئات الرئيسية التي يمكن تمثل تحديا لترامب تهدف إلى إحداث حالة من الارتباك والتشتيت وتثبيط الهمة من التصويت في النهاية".
وعلى الرغم من أن البيانات التي استخدمها الباحثون قدمتها منصات "فيسبوك" و"تويتر" و"غوغل"، إلا أنهم انتقدوا "الاستجابة المتأخرة وغير المنسقة" من جانب هذه الشركات أمام حملة التضليل الروسية.
وأبرز الباحثون تفاصيل كان من الممكن أن تقود شركات الإنترنت إلى اكتشاف التدخل في وقت مبكر، مثل استخدام الروبل الروسي لشراء الإعلانات وتوقيعات الإنترنت المتعلقة بقاعدة عمليات تابعة لوكالة أبحاث الإنترنت.
وتعد الوكالة من بين ثلاث شركات وجهت إليها اتهامات في وقت سابق هذا العام، كجزء من تحقيقات خاصة قادها المستشار روبرت مولر في التدخل الروسي في الانتخابات الأمريكية عام 2016. ويواجه 12 موظفا من موظفي الوكالة اتهامات التحريض فضلا عن ممولها المزعوم، يفغيني بريغوجين.
وقال التقرير :"انتقلت وسائل التواصل الاجتماعي من كونها بنية تحتية طبيعية لمشاركة الأحزان الجماعية و تنسيق الأنشطة المدنية إلى كونها أداة حسابية لتحقيق سيطرة اجتماعية، يتلاعب بها مستشارون سياسيون يتسمون بالدهاء يستعين بهم الساسة في الأنظمة الديمقراطية والديكتاتورية على حد سواء".

Monday, November 12, 2018

भेल ने तेलंगाना में 120 मेगावाट क्षमता की पनबिजली इकाई चालू की

हले चरण के चुनाव में भाजपा की ओर से विधायक संतोष बाफना और सरोजनी बंजारे, जगदलपुर और डोंगरगढ़ सीट से उम्मीदवार हैं। वहीं कांग्रेस के नौ विधायक भानुप्रतापपुर से मनोज सिंह मंडावी, कोंडागांव से मोहन लाल मरकाम, बस्तर से लखेश्वर बघेल, चित्रकोट से दीपक कुमार बैज, दंतेवाड़ा से देवती कर्मा, कोंटा से कवासी लखमा, खैरागढ़ से गिरीवर जंघेल, केसकाल से संतराम नेताम और डोंगरगढ़ से दलेश्वर साहू पर पार्टी ने फिर से भरोसा जताया है। 

दंतेवाड़ा सीट से उम्मीदवार देवती कर्मा पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा की पत्नी हैं। महेंद्र कर्मा ने बस्तर क्षेत्र में सलवा जुडूम आंदोलन की शुरूआत की थी। 25 मई वर्ष 2013 को झीरम हमले में कर्मा की मृत्यु हुई थी। देवती कर्मा के खिलाफ भीमा मंडावी चुनाव मैदान में है। वहीं कवासी लखमा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और कांग्रेस विधायक दल के उपनेता हैं। कोंटा कांग्रेस की परंपरागत सीट है। इस सीट से भाजपा के धनीराम बरसे लखमा के खिलाफ उम्मीदवार हैं। चुनाव प्रचार के आखिरी दिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सभा संबोधित की। वह लोरमी, मुंगेली, साजा और कवर्धा विधानसभा क्षेत्र में आमसभा को संबोधित की। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो की भी चुनावी सभाएं कर हुंकार भरी। ये सभाएं डीएनके कालोनी नारायणपुर, रायपुर ग्रामीण के माना में हुईं।

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह गरियाबंद और राजिम में सभा और राजनांदगांव में रोड शो किया। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज अहिवारा और रायपुर उत्तर में हॉल मीटिंग भिलाई में जनसभा को संबोधित कर एकबार फिर रमन सरकार बनाने की बात कही।सार्वजनिक क्षेत्र की भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) ने तेलंगाना में पुलिचिंतला पनबिजली परियोजना की 30 मेगावाट क्षमता की चौथी और अंतिम इकाई चालू कर दी है। इसके साथ 120 मेगावाट क्षमता (30-30 मेगावाट की चार इकाई) की इकाइयां पूरी तरह चालू हो गयी है।
कंपनी ने सोमवार को एक बयान में कहा कि भेल ने इससे पहले, 30-30 मेगावाट की तीनों इकाई चालू की थी। तेलंगाना के सूर्यापेट जिले में स्थित यह परियोजना तेलंगाना स्टेट पावर जनरेशन कारपोरेशन लिमिटेड( टीएसजीईएनसीओ) ने कृष्णा नदी पर लगायी है। पुलिचिंतला पनबिजली परियोजना से गैस उत्सर्जन में कमी आएगी और कम कार्बन उत्सर्जन वाले विकास रास्ते को प्राप्त करने में मदद मिलेगी।

कंपनी के अनुसार परियोजना के लिये उपकरण भेल के भोपाल, झांसी, रूद्रपुर और बेंगलुरू स्थित कारखानों में बनायी और आपूर्ति की गयी। भेल ने तेलंगाना में अबतक कुल 1,073 मेगावाट क्षमता की पनबिजली परियोजनाएं चालू कर चुकी है

Wednesday, October 10, 2018

अपने तरीके सुधारें दोनों पक्ष

राफेल सौदे में कुछ स्पष्टता की आवश्यकता जरूर महसूस होती है. इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय वायुसेना को आधुनिक लड़ाकू विमानों की बहुत जरूरत है और उन्हें हासिल करने जैसे हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा से संबद्ध अहम फैसले टालते जाने की यूपीए सरकार और उसमें भी उसके रक्षा मंत्री एके एंटनी की प्रवृत्ति की वजह से इसमें बहुत देर हो गयी. 
 
पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा दिसंबर, 2012 में जिस सौदे की बातचीत की गयी, उसमें कीमत तथा रणनीतिक जरूरतों के लिहाज से राफेल सबसे स्वीकार्य समझा गया था. इस सौदे के अंतर्गत 18 विमान तो फ्रांस से उड़कर ही आने थे, जबकि 118 विमानों का निर्माण हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा भारत में ही किया जाना था. मार्च, 2014 में पक्के किये गये इस करार की कुल लागत 36 हजार करोड़ रुपये थी, जिसके अंतर्गत सार्वजनिक की गयी प्रति विमान की कीमत 526.1 करोड़ रुपये थी. 
 
यह भी एक सच्चाई है कि अप्रैल 2015 के अपने फ्रांसीसी दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्ववर्ती करार को रद्द करते हुए यह घोषणा की कि कुल 1670 करोड़ रुपये प्रति विमान की लागत पर 36 विमान सीधे तैयार हालत में खरीदे जायेंगे. 
 
यह नयी दर पहले वाले सौदे से मोटे तौर पर तीन गुना अधिक थी. दासौं एविएशन के वर्ष 2016 की वार्षिक रिपोर्ट में दर्ज होने की वजह से इस कीमत की जानकारी सार्वजनिक डोमेन में है. पुनरीक्षित सौदे के अंतर्गत भारतीय साझीदार के रूप में एचएएल को छोड़ दिया गया. फिर दासौं ने बहुत सारी भारतीय कंपनियों से साझीदारी के समझौते किये, जिनमें अनिल अंबानी का रिलायंस समूह सर्वप्रमुख था.
 
अब विपक्ष सरकार से यह पूछ रहा है कि नये सौदे में क्यों इसकी कीमत तीन गुनी अधिक हो गयी. विपक्ष यह भी जानना चाह रहा है कि क्यों एचएएल द्वारा निर्माण के विकल्प को छोड़ साझीदारों के रूप में कई अन्य कंपनियों के साथ रिलायंस समूह को चुना गया. 
 
सरकार का उत्तर है कि यह एक अंतर-सरकारी करार था, जिसमें कोई भी बिचौलिया शामिल नहीं था; विमान में लगायी गयी अत्याधुनिक शस्त्र प्रणालियों तथा उपकरणों को देखते हुए उसकी कीमत वस्तुतः सस्ती है और दासौं द्वारा अपने साझीदारों के रूप में अन्य कई कंपनियों के साथ रिलायंस समूह के चयन में सरकार की कोई भूमिका नहीं थी.
 
इन दो बिल्कुल विपरीत नजरिये के मध्य एक पूर्ण युद्ध जैसे हालात बने हैं. विपक्ष की कोशिश है कि भ्रष्टाचार, पारस्परिक लाभ एवं रक्षा खरीद प्रक्रियाओं के उल्लंघन के आरोप लगाकर राफेल को वर्तमान सरकार का ‘बोफोर्स’ बना दिया जाये. 
 
च तो यह है कि विपक्ष के आरोपों में यदि सच्चाई हो, तो भी उनका प्रचार कर वह कोई बहुत अच्छा काम नहीं कर रहा. सामान्य जन के लिए विपक्ष का यह नजरिया स्वीकार्य नहीं हो सका है कि रक्षा सौदों में भारी गड़बड़ी हुई है. न तो यह कोई राष्ट्रीय मुद्दा बन सका है, न ही यह उस स्तर के निकट पहुंच सका है, जहां बोफोर्स को ले जाया गया था और न ही प्रधानमंत्री या उनकी सरकार की विश्वसनीयता पर उनका कोई असर पड़ता दिखता है. 
 
सरकार भी अपना बचाव भलीभांति करती नजर नहीं आती. गोपनीयता के नियम का हवाला देकर इन विमानों की पुनरीक्षित कीमत उजागर न करने की उसकी शुरुआती कोशिश शायद ही विश्वसनीय थी, क्योंकि ज्यादातर जानकारियां तो पहले ही सार्वजनिक हो चुकी हैं
 
उसके द्वारा एक के बाद दूसरे विरोधाभासी बयानों से यह धारणा ही बलवती हुई कि कहीं कुछ है, जिसे वह छिपा रही है. पहले तो यह कहा गया कि इस मामले में सरकार की कोई भूमिका नहीं थी और यह पूरी तरह दासौं का निर्णय था. 
 
फिर जब पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति ओलांद ने यह कह दिया कि एक साझीदार के रूप में अनिल अंबानी का चुनाव केवल भारतीय पक्ष के कहने पर ही किया गया था, तो रक्षा मंत्री ने वस्तुतः यह आरोप लगा दिया कि राहुल गांधी एवं ओलांद ने मिलकर भारत सरकार को बदनाम करने की साजिश की है. सच कहा जाये, तो एक मित्र देश के पूर्व राष्ट्राध्यक्ष पर ऐसे आरोप मढ़ देना हास्यास्पद ही है.
 
सरकार के लिए सबसे अच्छा रास्ता यह होगा कि वह पारदर्शिता का विकल्प चुने. यदि उसने कुछ भी गलत नहीं किया है, तो राष्ट्रीय सुरक्षा सरोकारों के मद्देनजर वह जिस सीमा तक जानकारी साझा कर सकती है, क्यों न वह उसे कर ही डाले? 
 
जहां तक उचित हो, विमान की कीमत से संबद्ध सभी तथ्य सार्वजनिक जानकारी में लाये जाने चाहिए. राफेल की कीमत तीन गुना तक बढ़ने और किसी खास कॉरपोरेट घराने को साझीदार के रूप में चुने जाने को लेकर उपजे संदेह का विश्वसनीय तरीके से निराकरण किया जाना चाहिए और इस विषय पर किसी भी मंत्री द्वारा बोले जाने की बजाय केवल रक्षा मंत्री अथवा स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा बोला जाना चाहिए.
 
गोपनीयता की हर कोशिश से रक्षा घोटाले के आरोपों को बल मिलता है. यदि सरकार को अपनी निर्दोषिता का इतना ही भरोसा है, तो यह एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) द्वारा इसकी जांच को भी तैयार हो सकती है. इसे पहले भी जेपीसी गठित की जा चुकी है और खुद भाजपा ही इसकी सबसे अधिक मांग करती रही है.

Monday, September 17, 2018

नज़रिया: राहुल और अखिलेश को आमंत्रित कर क्या संघ अपनी छवि बदलना चाहता है?

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) ने नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को आमंत्रित किया था.
यह संघ का शुरुआती प्रयोग था जो नागपुर से निकल कर अब दिल्ली पहुंच चुका है.
दिल्ली के विज्ञान भवन में आरएसएस का तीन दिवसीय मंथन चल रहा है, जिसमें संघ के लोग देश के भविष्य पर चर्चा कर रहे हैं.
चर्चा का विषय है- 'भारत का भविष्यः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण.' इसके पहले दिन यानी सोमवार को सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपना दृष्टिकोण रखा.
इस तीन दिन की चर्चा में संघ के कई एजेंडे शामिल हैं. संघ से जुड़े लोगों का कहना है कि आरएसएस अब हिचकना नहीं चाहता और यह देश को खुल कर संदेश देना चाहता है कि वो विचारधारा के केंद्र में है.
वो यह भी स्पष्ट तौर पर बताना चाहता है कि उसका भाजपा की राजनीति और नीतियों पर कब्जा है.
राहुल, भाजपा और संघ
आरएसएस ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और दूसरे विपक्षी दलों के नेताओं को अपने आयोजनों में आमंत्रित कर, उन लोगों को कड़ा संदेश देने की कोशिश की है जो आरएसएस को एक 'एक्सक्लूसिव' संगठन बताते हैं.
जिन लोगों पर संगठन ने मानहानि का मुकदमा किया है, उन्हें आमंत्रित कर वो एक चतुर राजनीति खेलना चाहता है.
राहुल गांधी, भाजपा और संघ पर नफ़रत की राजनीति करने के आरोप लगाते रहे हैं. राहुल गांधी यह भी कहते रहे हैं कि वो उनकी नफ़रत का जवाब प्यार से देंगे.
उन्होंने सबको चकित करते हुए संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगा कर यह संदेश देने की कोशिश भी की थी.
आरएसएस ने राहुल के उसी कथन को परखने के लिए मोहन भागवत को सुनने की चुनौती देने की कोशिश की थी.
कांग्रेस पार्टी आरएसएस के आमंत्रण पर चुप्पी साधे हुए है. उसका कहना है कि राहुल गांधी उनके कार्यक्रम में ज़रूर जाते अगर उन्हें वहां बोलने को कहा जाता. वो उस विचारधारा को सिर्फ सुनने क्यों जाएंगे जिसका वो विरोध करते हैं.
उनका यह बहाना बहुत पल्ले नहीं पड़ता.
वहीं अखिलेश यादव का कहना है कि वो आरएसएस को बहुत कम जानते हैं. उन्हें जो मालूम है वो यह है कि सरदार पटेल ने संघ पर प्रतिबंध लगाया था और वो स्वयं इससे दूर रहना चाहते हैं.
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के आरएसएस के गढ़ नागपुर में भाषण के बाद, कांग्रेस ने उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी को मैदान में उतारा और कहा कि भाषण भुला दिए जाएंगे और तस्वीरें रह जाएंगी.
विज्ञान भवन में चल रही चर्चा एक तय योजना की दूसरी कड़ी है. पहली कड़ी का आयोजन मुंबई में हुआ था, जिसमें भी सरसंघचालक मोहन भागवत बोले थे.
संघ न सिर्फ़ देश और अपने विरोधियों को संदेश देना चाहता है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भी यह बताना चाहता है कि संगठन की ताक़त पार्टी से कितनी बड़ी है.
इससे पहले मोहन भागवत ने अमित शाह के 'कांग्रेस मुक्त भारत' के नारे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि यह राजनीतिक मुहावरे हैं न कि संघ की भाषा का हिस्सा.
आरएसएस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी नाराज़ दिखा था जब उन्होंने सरसंघचालक मोहन भागवत की मुरली मनोहर जोशी को राष्ट्रपति बनाए जाने की इच्छा को नज़रअंदाज कर दिया था.
आरएसएस धीरे-धीरे ख़ुद को बदल रहा है. हाल ही में संगठन ने अपने पहनावे में बदलाव किया था.
संघ के एक बड़े नेता का कहना है कि भागवत बार-बार इस बात को दोहराते हैं कि "जो भारत को अपनी मातृभूमि मानता है, वो सभी अपने हैं. हमलोग स्पष्ट रूप से हिंसा के ख़िलाफ़ हैं."
संघ चाहता है कि लोग इन बातों से रूबरू हों. पर क्या आरएसएस संदेश देने में कामयाब हो रहा है?
मोहन भागवत हाल ही में विश्व हिंदू सम्मेलन के कार्यक्रम के लिए शिकागो गए थे, जहां उन्होंने कहा था कि "जंगली कुत्ते एक शेर पर हमला कर रहे हैं." उनके इस बयान की आलोचना हुई.
भाजपा की केंद्र में सरकार है और वो देश के 22 राज्यों में राज कर रही है.
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता, जो आरएसएस से जुड़े रहे हैं, कहते हैं कि हमारी असल सफलता यह है कि हम लोगों को यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि देश पर राज वो ही करेगा जो बहुसंख्यकों की राजनीति करता हो. हम लोगों ने देश की सोच बदली है. भारत एक हिंदू प्रधान देश है.
अब 2019 यह तय करेगा कि यह देश भीमराव आंबेडकर के दर्शन से चलेगा या फिर आरएसएस के हिंदू दर्शन से.