Tuesday, May 21, 2019

गांधी की हत्या से पहले क्या कर रहे थे गोडसे और आप्टे

दिल्ली के कनॉट प्लेस के मरीना होटल के ठीक आगे स्थित मस्जिद में मग़रिब की नमाज़ शुरू होने वाली है.
रमज़ान का महीना है. उसके बाद रोज़ा खोला जाएगा. मरीना होटल के एक कमरे से एक शख़्स मस्जिद की हलचल को देख रहा है.
मालूम नहीं कि उस शख़्स को पता है या नहीं कि 17 जनवरी, 1948 को जब दिल्ली में कड़ाके का जाड़ा पड़ रहा था, तब इसी होटल में, जिसे अब रेडिसन ब्लू मरीना होटल कहा जाता है, नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे आए.
वक़्त सुबह 11 बजे से पहले का था. दोनों ने एस देशपांडे और एसएन देशपांडे नामों से कमरा बुक करवाया.
उस दौर में आज की तरह किसी होटल में रूम बुक करवाते वक़्त आधार कार्ड या कोई और पहचान पत्र नहीं दिखाना पड़ता था.
ये दोनों मित्र 15-20 मिनट में पहुंच गए होंगे काली-पीली टैक्सी से कनॉट प्लेस. ये होटल जाते वक़्त अलबुकर्क रोड (अब तीस जनवरी मार्ग) से गुज़रे होंगे.
उस दिन यहां के बिड़ला हाउस में 79 साल के महात्मा गांधी का उपवास चल रहा होगा.
इन्होंने देखा होगा कि बिड़ला हाउस की तरफ़ हज़ारों दिल्ली वाले बापू से अपना उपवास समाप्त कराने के लिए पहुंच रहे हैं.
दरअसल आप्टे और गोडसे दिल्ली में गांधी जी की हत्या करने की भयानक योजना को अंजाम देने के लिए आए थे.
उन्हें होटल के फ़र्स्ट फ्लोर का कमरा नंबरा 40 मिला. गोडसे और आप्टे बंबई से हवाई सफ़र करके सफ़दरजंग एयरपोर्ट पर उतरे थे.
इनके शेष साथी ट्रेन से दिल्ली आ रहे थे. तब तक पालम एयरपोर्ट भी चालू नहीं हुआ था. इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट की तो बात ही छो
अंत में दंगाईयों पर नैतिक दबाव डालने के इरादे से गांधी ने 12 जनवरी, 1948 को अपने जीवन का अंतिम उपवास रखने का निर्णय लिया. उनके पुत्र देवदास गांधी, जो तब हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक थे, ने उन्हें उपवास पर ना जाने की सलाह दी थी. दूसरा, जब देश का विभाजन हुआ तब सरकारी संपत्ति भारत-पाकिस्तान में बंटी.
सरकारी ख़ज़ाने में उपलब्ध रुपया भी बंटा. तब पाकिस्तान के हिस्से के 75 करोड़ आए. भारत सरकार ने शुरू में पाकिस्तान को 20 करोड़ रुपये दे दिए दिए. अब बचे 55 करोड़ रुपये. बापू चाहते थे कि ये राशि भी पाकिस्तान को अविलंब दे दी जाए. इन कारणों से गोडसे और उनके साथी बापू से नाराज़ थे.
ख़ैर, गोडसे और आप्टे को अब अपने शेष साथियों के आने का इंतज़ार था. ये कोई दिल्ली दर्शन के लिए नहीं आए थे.
शाम होते-होते इनके साथी, जिनमें मदनलाल पाहवा, विष्णु करकरे और गोपाल गोडसे शामिल थे, मरीना होटल पहुंच गए.
ये हैंडग्रेड, टाइम बम और पिस्तौल लेकर दिल्ली आए थे.
'फ्रीडम एट मिड नाइट' में लेखक द्वय डोमिनीक लापिएर और लैरी कॉलिन्स दावा करते है कि मरीना होटल के कमरे में गांधी जी की हत्या पर चर्चा का प्लान बनाते वक़्त करकरे अपने और आप्टे के लिए व्हस्की मंगवाते हैं. गोडसे व्हस्की नहीं पीते थे. वो कॉफ़ी प्रेमी थे. वह मरीना होटल में बार-बार कॉफ़ी मंगवाता रहते थे.
मरीना होटल में तय हुआ कि गांधी जी पर 20 जनवरी को उनकी प्रार्थना सभा के दौरान बम से हमला किया जाएगा. इस दौरान ये सब बिड़ला हाउस का जायज़ा लेते रहे. तय तारीख़ 20 जनवरी आ गई. नाथूराम गोडसे, गोपाल गोडसे, नारायण आप्टे, विष्णु करकरे और मदनलाल पाहवा टैक्सी लेकर बिड़ला हाउस पहुंचे. आप्टे ने रीगल से भाव-ताव के बाद बिड़ला हाउस के लिए टैक्सी ली. बिड़ला हाउस में विस्फोट मदनलाल पाहवा ने किया.
बाद में पता चला कि वह एक क्रूड देसी क़िस्म का बम था जिसमें नुक़सान पहुंचाने की ज्यादा क्षमता नहीं थी. उस विस्फोट के लिए मदन लाल पाहवा को पकड़ा गया. ये सब गांधी जी की जान के प्यासे थे ही. इनका इरादा था कि पहले प्रार्थना सभा में बम फेंका जाएगा. जब वहां पर भगदड़ मच जाएगी तो बापू पर गोलियां बरसा दी जाएंगी.
ड़ दीजिए.
क्यों थे बापू से खफा
दरअसल जब इन्हें 12 जनवरी, 1948 को मालूम हुआ कि गांधी जी 13 जनवरी से अपना उपवास चालू कर रहे हैं, बस तब ही इन्होंने गांधी की हत्या करने का मन बना लिया था.
गांधी जी के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी की पौत्री और लेखिका सुकन्या भरत राम कहती हैं, "गोडसे, आप्टे और इनके साथी गांधी जी से दो कारणों से बेहद ख़फ़ा थे. पहला, गांधी जी ने दिल्ली में 13 जनवरी, 1948 को अपना उपवास क्यों चालू किया? गांधी जी ने वह उपवास इसलिए रखा था क्योंकि दिल्ली में मुसलमानों को मारा जा रहा था. उनकी संपत्तियां लूटी जा रही थीं. हिंसा और आगज़नी थमने का नाम ही नहीं ले रह थी. सारे प्रयास विफल हो रहे थे.''

Monday, May 6, 2019

चार महीने में कितना जादू दिखा सकीं प्रियंका गांधी

अख़बार लिखता है कि सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने 2 मई को यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच कर रही समिति को एक पत्र लिखा था.
इसमें जस्टिस चंद्रचूड़ ने लिखा है कि जांच करने वाली समिति में एक बाहरी सदस्य को भी शामिल किया जाए.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की कुछ रिटायर्ड महिला जजों को भी समिति में शामिल करने का सुझाव दिया है. इसमें जस्टिस रुमा पाल, जस्टिसल सुजाता मनोहर और जस्टिस रंजना देसाई शामिल हैं.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल ने इस बात से इनकार किया है कि जस्टिस चंद्रचूड़ ने समिति की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस बोबड़े से शुक्रवार को मुलाक़ात की थी.
इंडियन एक्सप्रेस ने इस पर खेद जताते हुए लिखा है कि जस्टिस चंद्रचूड़ ने जस्टिस बोबड़े से गुरुवार को मुलाक़ात की थी न कि शुक्रवार को.
नवभारत टाइम्स की ख़बर के मुताबिक़, किसी पब्लिक मीटिंग या रोड शो के दौरान अब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को माला पहनाना या उनसे हाथ मिलाना आसान नहीं होगा.
अगर कोई ऐसा करना भी चाहेगा तो पहले उसे मुख्यमंत्री की सुरक्षा के घेरे को पार करना होगा. यहां से हरी झंडी मिलने के बाद ही वो केजरीवाल के क़रीब जा पाएगा, वरना नहीं.
शनिवार को मोती नगर इलाक़े में केजरीवाल को थप्पड़ मारे जाने के बाद दिल्ली पुलिस ने उनकी सुरक्षा में बड़े स्तर पर बदलाव किए हैं, जिसमें एक बदलाव यह भी है कि उनके पास जाने से लोगों को रोका जाए.
ये भी पढ़ें: केजरीवाल को थप्पड़, आप
उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने अमेठी और रायबरेली में अपने मतदाताओं से कांग्रेस के पक्ष में वोट डालने की अपील की.
हालांकि इन दोनों जगहों पर गठबंधन ने उम्मीदवार न उतारने का फ़ैसला किया था और उम्मीदवार उतारे भी नहीं थे, लेकिन सवाल ये है कि इस घोषणा के बावजूद मायावती को ऐसी अपील क्यों करनी पड़ी.
क्या मायावती की यह अपील भविष्य में बनने वाली सरकार का स्वरूप तय करेगी?
पूर्व में मायावती जितना भाजपा पर अक्रामक रही हैं, उससे कहीं ज़्यादा कांग्रेस को उन्होंने निशाने पर लिया है.
मायावती ने रविवार को भी दोनों पार्टियों को निशाने पर लिया, लेकिन अंत में कांग्रेस के प्रति उनका लहजा थोड़ा मधुर हो गया.
उन्होंने कहा, "कांग्रेस और भाजपा एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं. इसके बावजूद भी हमने देश और आम जनहित में ख़ासकर भाजपा और आरएसएसवादी ताक़तों को कमज़ोर करने के लिए उत्तर प्रदेश की अमेठी और रायबरेली सीट को कांग्रेस पार्टी के लिए इसलिए छोड़ दिया था ताकि इस पार्टी के दोनों सर्वोच्च नेता इन दोनों सीटों में उलझ कर न रह जाएं."
"यदि ये अकेले यहां चुनाव लड़ते हैं तो ये देश की अन्य सीटों को जीतने में अपनी ऊर्जा लगा सकेंगे. अगर गठबंधन ऐसा नहीं करता तो भाजपा इसका फ़ायदा उठाती."
ने बीजेपी पर लगाया आरोप
अब सवाल यह उठता है कि कांग्रेस का हमेशा विरोध करने वाली मायावती इतनी नरम क्यों पड़ रही हैं?
इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि मायावती को अल्पसंख्यकों का वोट चाहिए. इसलिए वो यह नहीं दिखाना चाहती हैं कि वो कांग्रेस को हरा कर भाजपा को जिताना चाहती हैं.
वो कहते हैं, "उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश की दो सीटों पर कांग्रेस कोzउनको दिल्ली में प्रधानमंत्री या उप प्रधानमंत्री बनना है तो उन्हें भाजपा या कांग्रेस से हाथ मिलाना होगा."
"भाजपा में मायावती को इन पदों की गुंजाइश कम नज़र आती है, इसलिए कांग्रेस को वो विकल्प के रूप में देखती हैं. कांग्रेस के साथ जाने में यह भी फ़ायदा है कि आगे चल कर अल्पसंख्यक उनसे नाराज़ नहीं होंगे."
रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि मायावती यह भी सोचती हैं कि कांग्रेस की सीटें कम आती हैं और अगर एचडी देवेगौड़ा या इंद्र कुमार गुजराल जैसी स्थिति बनती है तो वो सत्ता पर क़ाबिज़ हो सकती हैं.
मायावती की राजनीति कांग्रेस विरोध की रही है. जब अस्सी के दशक में कांसीराम ने बहुजन समाज पार्टी को स्थापित करना शुरू किया, उस वक़्त भाजपा इतनी ताक़तवर पार्टी नहीं थी.
कांग्रेस के विरोध के कारण ही बसपा का जन्म हुआ है इसलिए उसका मूल चरित्र कांग्रेस विरोध का रहा है. आज की राजनीति में भी बसपा अपने मूल चरित्र से बाहर नहीं जा सकती है. यह एक स्थायी भाव है, जिसके तहत पार्टी कांग्रेस की आलोचना करती है.
बसपा का दलित वोट ही उनका आधार है, जो कभी कांग्रेस का हुआ करता था. कभी भी यह वोट बैंक कांग्रेस की तरफ़ लौट सकता है, यह ख़तरा बसपा को हमेशा महसूस होता है.
वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं, "आज राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है. पिछले कुछ चुनावों में कांग्रेस हाशिएए पर चली गई और भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की जगह ले ली."
"आज की स्थिति में दलित और ग़ैर-यादव ओबीसी वोटों पर भाजपा ने सेंध लगा दी है. 2014 में भी इस वर्ग का बड़ा समर्थन नरेंद्र मोदी को मिला था."
वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं कि अगर भाजपा को रोकना है तो कांग्रेस का भी छुपा हुआ हाथ गठबंधन पर होना चाहिए. ये ज़रूरत पहले से महसूस की जा रही थी.
"कांग्रेस के साथ सपा-बसपा का गठबंधन भले न हो पाया हो, लेकिन भीतर ही भीतर भाजपा को हराने के लिए आज उन्हें महसूस हो रहा है कि कांग्रेस साथ में होनी चाहिए थी."
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